कुछ यादें गुज़रे हुए पलों की .......

Wednesday, 25 September 2013

पैरों के निशान



मैं हिमालय की उस घाटी में,
जो दुर्गम, गहन, गंभीर थी,
उतरता चला गया,
विचारों के प्रतिरूप में,
ढलता चला गया .......

जो प्रतिबिम्ब मिले थे राह में,
अतीत की चादर ओढ़े हुए,
पाँव बाहर निकालते थे,
भविष्य की थाह लेने को,
मैं उस निर्जीव रास्ते पे,
चलता चला गया,
उम्मीद के बादलों में,
घुलता चला गया ........

कुछ धुप के धुंधले,
कुछ अंधियारे से उजले,
फलक की ओर ताकते,
सूखी घास में दबे हुए,
उस पौधे से मैं,
बतियाता चला गया,
ज़मीं पे पैरों के निशान,
बनाता चला गया ।।

-दिवांशु गोयल 'स्पर्श'

Sunday, 18 August 2013

तकाज़ा

 
 
मर कर भी वो परिंदा बेख़ौफ़ चलता रहा,
लोग जश्न मनाते रहे, मैं जलता रहा,

दिवाली की रात हो या ईद की नमाज़,
ये शहर अब तलक क्यूँ दहलता रहा,

वो जिहाद को आईना न दिखा सका,
पिंजरे में बंद इन्कलाब मचलता रहा,

मैं गुमराह था की वो मुश्फ़िक* है मेरा,
वो अपना रंग कदम दर कदम बदलता रहा।

इस दुनिया ने तकाज़ा कुछ इस तरह किया,
मैं ठोकरें खाते खाते संभालता रहा।

*मुश्फिक- दोस्त

-दिवांशु